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happy farmer penang online poker deutschland legal ★ yabo official site at www.22bet99.com; easy to remember URL is www.99bet99.com .हेल्थ इंश्योरेंस में कवर होंगी मानसिक बीमारियां, क्या बढ़ेगा प्रीमियम?

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हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी आम तौर पर शारीरिक बीमारियों से जुड़ी होती हैं. जैसे किसी अंग के खराब होने और इसके उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती होने पर आने वाले खर्च की भरपाई बीमा कंपनी करती है. हालांकि, अब मानसिक बीमारियां भी इन इंश्योरेंस पॉलिसी के दायरे में आएंगी. इसका मतलब यह है कि इनके उपचार पर होने वाला खर्च बीमित व्यक्ति को वापस मिलेगा.

इस साल मर्इ में मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 लागू हो गया है. यह कहता है कि सभी बीमा कंपनियों को मेडिकल इंश्योरेंस में मानसिक बीमारियों के उपचार के लिए प्रावधान करने होंगे. यह ठीक वैसे ही होगा जैसे कि शारीरिक बीमारियों के मामले में होता है.

इसे देखते हुए बीमा नियामक इरडा ने एक सर्कुलर जारी किया. इसमें बीमा कंपनियों को तत्काल प्रभाव से मेंटल हेल्थकेयर एक्ट के इस प्रावधान का अनुपालन करने के लिए कहा गया है.

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इसका मतलब हुआ कि शारीरिक बीमारियों के उपचार में जो लाभ मिलते हैं, वे मानसिक बीमारियों के मामले में भी मिलेंगे.

एक्ट में मानसिक बीमारी की क्या है परिभाषा?
एक्ट में मानसिक बीमारी की साफ परिभाषा दी गर्इ है. बीमा कंपनियों को इस परिभाषा का ध्यान रखना होगा. यह कहती है, "मानसिक बीमारी का मतलब सोच, मनोदशा, धारणा या याददाश्त का विकार है जो व्यवहार को प्रभावित करता है. इसके चलते वास्तविकता या जीवन की सामान्य मांगों को पूरा करने और नशीली दवाओं के दुरुपयोग से जुड़ी मानसिक स्थितियों को पहचानने की क्षमता खत्म हो जाती है. लेकिन, इसमें मेंटल रिटार्डेशन (मानसिक मंदता) शामिल नहीं है. यह स्थिति पूरा मानसिक विकास न होने के कारण बनती है."

क्या निष्कर्ष निकलते हैं?
इस परिभाषा से दो महत्वपूर्ण चीजें सामने आती हैं. पहला, इसमें मेंटल रिटार्डेशन को शामिल नहीं किया गया है. दूसरा, इसमें शराब और नशीली दवाओं के दुरुपयोग से जुड़ी मानसिक स्थितियां शामिल हैं. बीमा कंपनियां दूसरी स्थिति को एक्सक्लूजन की लिस्ट में रख सकती हैं.

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पॉलिसीबाजार डॉट कॉम में हेड प्रोडक्ट एंड इनोवेशन वैद्यनाथन रमानी कहते हैं, "शारीरिक बीमारी के मामले में क्लेम के लिए 24 घंटे अस्पताल में भर्ती होना जरूरी है. इसी तरह शराब पीने से हुए किसी हादसे को कवर के दायरे के बाहर रखा जाता है. मानसिक बीमारियों के मामले में भी यही बात लागू हो सकती है."

क्या मौजूदा पॉलिसी पर लागू होंगे नियम?
बीमा कंपनियों को अपने मौजूदा प्लानों को नियामक के पास दोबारा फाइल करना पड़ सकता है. पॉलिसी की कीमतों में बदलाव होने की भी आशंका है. रमानी कहते हैं, "जिस दिन से यह रेगुलेशन जारी हुआ है, उसी दिन से बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों को कवर करना शुरू कर देना है. मौजूदा प्लान में मानसिक बीमारियों को वैसे ही कवर किया जाएगा जैसा कि एक्ट में बताया गया है. इनका दायरा बढ़ने के साथ 6 से 10 महीनों में कंपनियां प्रीमियम बढ़ाने का फैसला कर सकती हैं."

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